Posted by: kapilkiduniya | December 15, 2007

‘गालिबन’

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती,
मरते हैं आरजू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती,
मौत का एक दिन मुआईं है, नींद क्यों रात भर नहीं आती?
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी, कुछ हमारी ख़बर नहीं आती,
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी, अब किसी बात पर नहीं आती,

Posted by: kapilkiduniya | December 13, 2007

बकौल: सआदत हसन मंटो

ज़माने के जिस दौर से इस वक्त हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफ़साने पढिये. और अगर आप इन अफ्सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब ये है कि ये ज़माना नाकाबिल-ए -बर्दाश्त है. मुझमें जो बुराइयाँ हैं वो इस एहद कि बुराइयाँ हैं. मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं. जिस नुक्स को मेरी तहरीर से मनसूब किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम का नुक्स है. मैं हंगामा पसंद नहीं. मैं लोगों के खयालात-ओ-जज्बात में हिजान पैदा करना नहीं चाहता. मैं तहजीब-ओ-तमद्दुन कि चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी. मैं इसे कपड़े भी नहीं पहनाना चाहता, इसलिए कि ये मेरा काम नहीं.

मैं तख्त-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक का इस्तेमाल करता हूँ. ताकि तख्त-ए-सियाह कि स्याही और ज्यादा नुमाया हो जाए. लोग मुझे तरक्की पसंद, फहश्निगार और खुदा जाने क्या क्या कुछ कहते हैं. लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख्त को गाली भी सलीके से नहीं दी जाती.

Posted by: kapilkiduniya | November 19, 2007

मीर तकी मीर:

मैं गिरिया-ए-खूनी रोके ही रहा वर्ना,
यक पल में ज़माने का याँ रंग बदल जाता,

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