ज़माने के जिस दौर से इस वक्त हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफ़साने पढिये. और अगर आप इन अफ्सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब ये है कि ये ज़माना नाकाबिल-ए -बर्दाश्त है. मुझमें जो बुराइयाँ हैं वो इस एहद कि बुराइयाँ हैं. मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं. जिस नुक्स को मेरी तहरीर से मनसूब किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम का नुक्स है. मैं हंगामा पसंद नहीं. मैं लोगों के खयालात-ओ-जज्बात में हिजान पैदा करना नहीं चाहता. मैं तहजीब-ओ-तमद्दुन कि चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी. मैं इसे कपड़े भी नहीं पहनाना चाहता, इसलिए कि ये मेरा काम नहीं.
मैं तख्त-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक का इस्तेमाल करता हूँ. ताकि तख्त-ए-सियाह कि स्याही और ज्यादा नुमाया हो जाए. लोग मुझे तरक्की पसंद, फहश्निगार और खुदा जाने क्या क्या कुछ कहते हैं. लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख्त को गाली भी सलीके से नहीं दी जाती.