Posted by: kapilkiduniya | December 15, 2007

‘गालिबन’

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती,
मरते हैं आरजू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती,
मौत का एक दिन मुआईं है, नींद क्यों रात भर नहीं आती?
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी, कुछ हमारी ख़बर नहीं आती,
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी, अब किसी बात पर नहीं आती,


Leave a response

Your response:

Categories